भादो का महीना आते ही झारखंड के कई गांवों में मांदर की आवाज सुनाई देने लगती है। अखड़ा सजाया जाता है, युवतियां जावा तैयार करती हैं और लोग सामूहिक रूप से करम देवता की पूजा करते हैं। करमा पूजा को करम पर्व, करम परब या कर्मा पूजा के नाम से भी जाना जाता है।
यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति, खेती, मेहनत और सामुदायिक एकता के प्रति आभार व्यक्त करने का पर्व है। करम वृक्ष की डाल इस उत्सव का मुख्य प्रतीक होती है। इसके चारों ओर पूजा, करम कथा, पारंपरिक गीत और नृत्य का आयोजन किया जाता है।
करमा पूजा कब मनाई जाती है?
करमा पूजा सामान्यतः भादो या भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर में यह तिथि प्रायः अगस्त या सितंबर में पड़ती है।
झारखंड सरकार करम पर्व को भादो महीने की ग्यारहवीं तिथि पर मनाया जाने वाला युवाओं, शक्ति और उल्लास से जुड़ा त्योहार बताती है। वहीं झाड़ग्राम जिला प्रशासन के अनुसार करम परब भाद्र महीने की शुक्ल एकादशी को मनाया जाता है और जावा गीत तथा करम गीत इसकी खास पहचान हैं।
तिथि और पूजा के समय में क्षेत्रीय पंचांग तथा स्थानीय परंपरा के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है। इसलिए अपने गांव के पाहन, पुजारी या परिवार के बुजुर्गों से सही समय की जानकारी लेना अच्छा रहता है।
करमा पूजा कहां मनाई जाती है?
करमा पूजा का सबसे अधिक उत्साह झारखंड में देखने को मिलता है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, छत्तीसगढ़ और असम के कई क्षेत्रों में भी यह पर्व मनाया जाता है। झारखंड से दूसरे राज्यों और देशों में जाकर बसे परिवार भी अपनी परंपरा के अनुसार करम पर्व मनाते हैं।
यह उत्सव अनेक आदिवासी तथा सदान समुदायों की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ है। हालांकि पूजा की सामग्री, गीत, व्रत और विसर्जन की विधि समुदाय के अनुसार बदल सकती है। भारत सरकार के उत्सव पोर्टल पर भी इसे झारखंड के प्रमुख सामुदायिक, नृत्य और प्रकृति-पूजन से जुड़े पर्व के रूप में बताया गया है।
करमा पूजा का इतिहास

करमा पूजा का इतिहास किसी एक राजा, युद्ध या लिखित घटना से नहीं जुड़ा है। इसकी परंपरा पीढ़ियों से मौखिक कथाओं, गीतों और कृषि-जीवन के माध्यम से आगे बढ़ती रही है। जब खेती वर्षा और प्रकृति पर निर्भर थी, तब अच्छी फसल, बीजों के अंकुरण और परिवार की खुशहाली के लिए करम देवता की आराधना की जाती थी।
करम पर्व से जुड़ी लोककथाओं के कई रूप मिलते हैं। सबसे प्रचलित कथा सात भाइयों और उनकी पत्नियों से संबंधित है।
कथा के अनुसार सात भाई खेती करके परिवार का पालन करते थे। एक दिन उनकी पत्नियां करम डाल के पास पूजा, गीत और नृत्य में व्यस्त हो गईं तथा खेत में भोजन पहुंचाना भूल गईं। भूखे लौटे भाइयों में से एक ने क्रोध में करम डाल को उखाड़कर नदी में फेंक दिया। इसके बाद परिवार को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
अपनी भूल का एहसास होने पर भाइयों ने करम देवता से क्षमा मांगी, करम डाल को वापस लाकर सम्मानपूर्वक पूजा की और परिवार में फिर सुख-समृद्धि लौट आई। इस लोककथा का मूल संदेश है कि प्रकृति, परंपरा और सामूहिक जीवन का अपमान नहीं करना चाहिए। इंडियन एक्सप्रेस ने भी करम पर्व से जुड़ी सात भाइयों वाली लोककथा तथा इसके कृषि-संबंधी महत्व का उल्लेख किया है।
करमा पूजा में जावा का महत्व
करमा पूजा से कुछ दिन पहले कई स्थानों पर युवतियां बांस की छोटी टोकरी में अनाज के बीज बोती हैं। इन अंकुरित पौधों को जावा कहा जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में जौ, धान, गेहूं, चना या दूसरे स्थानीय अनाज के बीज इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
जावा को प्रतिदिन स्वच्छ पानी देकर सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है। इस दौरान युवतियां जावा और करम गीत गाती हैं। अच्छे और हरे-भरे अंकुर को खेती, उन्नति और जीवन के विस्तार का प्रतीक माना जाता है।
करमा पूजा करने से क्या फल मिलता है?
धार्मिक और लोक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धापूर्वक करम देवता की पूजा करने से:
- खेतों में अच्छी फसल होने की कामना पूरी होती है।
- परिवार की सुख-समृद्धि और कुशलता बनी रहती है।
- भाई-बहन और परिवार के दूसरे सदस्यों का संबंध मजबूत होता है।
- युवाओं को शक्ति, उत्साह और सही कर्म करने की प्रेरणा मिलती है।
- गांव और समुदाय में प्रेम तथा एकता बढ़ती है।
- मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने का संदेश मिलता है।
ये धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं हैं। इस पर्व का वास्तविक सामाजिक महत्व लोगों को एक साथ लाने, प्रकृति का सम्मान करने और अपनी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में है।
करमा पूजा की सामग्री
पूजा की सामग्री स्थानीय परंपरा के अनुसार बदल सकती है। सामान्य रूप से निम्न वस्तुएं रखी जाती हैं:
- करम वृक्ष की डाल
- जावा की टोकरी
- मिट्टी या गोबर से लीपा हुआ पूजा-स्थान
- स्वच्छ जल
- फूल और पत्तियां
- अक्षत यानी साबुत चावल
- दीपक, रुई और तेल
- धूप या अगरबत्ती
- मौसमी फल
- चूड़ा, गुड़ और चना
- खीरा
- दूध, यदि स्थानीय परंपरा में प्रयोग होता हो
- प्रसाद के लिए पत्तल या स्वच्छ बर्तन
करम डाल लाते समय पेड़ और पर्यावरण को अनावश्यक नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। स्थानीय नियमों एवं समुदाय की परंपरा का पालन करना आवश्यक है।
करमा पूजा की पूरी विधि
1. घर और अखड़ा की सफाई
पूजा से पहले घर, आंगन या गांव के अखड़ा को अच्छी तरह साफ किया जाता है। कई स्थानों पर पूजा की जगह को मिट्टी या गोबर से लीपकर फूलों से सजाया जाता है।
2. जावा तैयार करना
कई समुदायों में पूजा से सात या नौ दिन पहले युवतियां टोकरी में अनाज के बीज बोती हैं। बीजों को नमी और छाया में रखा जाता है, जिससे सुंदर अंकुर निकल सकें। इन दिनों जावा गीत गाने की भी परंपरा है।
3. व्रत का संकल्प
व्रती अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार उपवास या संयम रखते हैं। कुछ स्थानों पर अविवाहित युवतियां व्रत करती हैं, जबकि दूसरे क्षेत्रों में विवाहित महिलाएं और परिवार के अन्य सदस्य भी पूजा में भाग लेते हैं।
4. करम डाल लाना
गांव के युवक या पूजा से जुड़े लोग जंगल अथवा निर्धारित स्थान पर जाकर करम वृक्ष की पूजा करते हैं। इसके बाद उसकी डाल सम्मानपूर्वक गांव लाई जाती है। रास्ते में पारंपरिक गीत गाए जाते हैं और मांदर बजाया जाता है।
5. करम डाल की स्थापना
करम डाल को अखड़ा या आंगन के बीच साफ मिट्टी में स्थापित किया जाता है। उसके आसपास जावा की टोकरी, फूल, फल और प्रसाद रखा जाता है।
6. दीपक और पूजा
करम देवता का ध्यान करके दीपक जलाया जाता है। फूल, अक्षत, जल और स्थानीय परंपरा में निर्धारित सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा परिवार के बुजुर्ग, पाहन या समुदाय के जानकार व्यक्ति के मार्गदर्शन में की जा सकती है।
मन में सरल प्रार्थना की जा सकती है:
“हे करम देवता, हमारे खेत-खलिहान, परिवार और समाज की रक्षा करें। हमें प्रकृति का सम्मान करने और अच्छे कर्म करने की शक्ति दें।”
7. करम कथा सुनना
पूजा के दौरान करम देवता से जुड़ी लोककथा सुनाई जाती है। कथा के माध्यम से मेहनत, संयम, प्रकृति के सम्मान और परिवार की एकता का संदेश दिया जाता है।
8. प्रसाद चढ़ाना
चूड़ा, गुड़, चना, खीरा, फल और दूसरे स्थानीय पकवान करम देवता को अर्पित किए जाते हैं। पूजा पूर्ण होने के बाद प्रसाद सभी लोगों में बांटा जाता है। The Indian Tribal के अनुसार चूड़ा, गुड़, चना और खीरा पारंपरिक प्रसाद में शामिल होते हैं तथा कई परिवार चिल्का रोटी भी बनाते हैं।
9. करम गीत और नृत्य
पूजा के बाद महिलाएं और पुरुष करम डाल के चारों ओर पारंपरिक गीत गाते हुए नृत्य करते हैं। मांदर, ढोल और नगाड़े की धुन पर यह उत्सव कई स्थानों पर पूरी रात चलता है।
10. करम डाल की विदाई
अगले दिन स्थानीय परंपरा के अनुसार करम डाल को नदी, तालाब या निर्धारित स्थान तक ले जाकर विदाई दी जाती है। यदि विसर्जन किया जाए तो प्लास्टिक, सिंथेटिक कपड़े या प्रदूषण फैलाने वाली सामग्री जल में नहीं डालनी चाहिए।
करमा पूजा में क्या बनाया जाता है?
करमा पूजा का भोजन सामान्यतः स्थानीय अनाज और घर में उपलब्ध सामग्री से तैयार किया जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में चूड़ा-गुड़, चना, खीरा, चिल्का रोटी, धुस्का, पिठा और अरसा रोटी बनाई जाती है। पकवानों की परंपरा हर परिवार और समुदाय में एक जैसी होना आवश्यक नहीं है।
नीचे झारखंड की पारंपरिक मीठी अरसा रोटी बनाने की आसान विधि दी गई है।
अरसा रोटी की पारंपरिक रेसिपी
अरसा रोटी चावल और गुड़ से बनने वाला हल्का कुरकुरा तथा अंदर से मुलायम मीठा पकवान है। इसे अरसा या अरसा पिठा भी कहा जाता है। करम पर्व सहित झारखंड के अनेक उत्सवों पर इसे परिवार और मेहमानों के लिए बनाया जाता है।
तैयारी का समय: चावल भिगोने सहित लगभग 6 घंटे
बनाने का समय: 30 मिनट
मात्रा: लगभग 14 से 16 अरसा
आवश्यक सामग्री
- अरवा चावल – 2 कप
- गुड़ – ¾ से 1 कप
- पानी – लगभग ¼ कप
- सौंफ – ½ छोटा चम्मच, वैकल्पिक
- इलायची पाउडर – एक चुटकी, वैकल्पिक
- तलने के लिए तेल या घी
अरसा रोटी बनाने की विधि
1. चावल भिगोएं
चावल को दो से तीन बार धोकर लगभग पांच से छह घंटे के लिए पानी में भिगो दें। चाहें तो इसे रातभर भी भिगोया जा सकता है।
2. चावल सुखाकर पीसें
भीगे चावल का पानी पूरी तरह निकाल दें। इसे साफ कपड़े पर लगभग 20 से 30 मिनट फैलाएं। चावल पूरी तरह सूखना नहीं चाहिए; उसमें हल्की नमी रहनी चाहिए। अब इसे मिक्सर या चक्की में बारीक पीसकर छान लें।
3. गुड़ की चाशनी बनाएं
कड़ाही में गुड़ और थोड़ा पानी डालकर धीमी आंच पर गर्म करें। गुड़ पिघलने के बाद उसे छान लें, जिससे गंदगी निकल जाए। छने हुए गुड़ को दोबारा हल्का गर्म करें। बहुत गाढ़ी या तार वाली चाशनी बनाने की आवश्यकता नहीं है।
4. आटा तैयार करें
गर्म गुड़ की चाशनी में चावल का आटा धीरे-धीरे डालते हुए मिलाएं। सौंफ या इलायची डालना हो तो इसी समय डालें। मिश्रण को इतना गाढ़ा रखें कि ठंडा होने पर उससे लोई बनाई जा सके।
आटे को ढककर लगभग 15 से 20 मिनट आराम दें।
5. अरसा का आकार बनाएं
हाथों पर थोड़ा तेल या घी लगाएं। आटे से छोटी लोई तोड़ें और उसे हल्का चपटा कर लें। अरसा को बहुत पतला न बनाएं, वरना तलते समय वह सख्त हो सकता है।
6. धीमी आंच पर तलें
कड़ाही में तेल या घी गर्म करें। आंच को धीमा से मध्यम रखें और पहले एक अरसा डालकर जांच लें। दोनों तरफ से गहरा सुनहरा होने तक तलें।
तैयार अरसा को छलनी या टिश्यू पेपर पर निकालें। ठंडा होने पर इसका बाहरी हिस्सा हल्का कुरकुरा और अंदर का भाग मुलायम हो जाएगा।
अरसा रोटी बनाते समय ध्यान रखें
- चावल में हल्की नमी रहने पर आटा अच्छी तरह बंधता है।
- गुड़ की चाशनी अधिक पकाने से अरसा सख्त हो सकता है।
- तेल बहुत गर्म होने पर अरसा बाहर से जल जाएगा और भीतर कच्चा रह सकता है।
- आटा गीला हो जाए तो थोड़ा चावल का आटा मिलाएं।
- यदि आटा बहुत सूखा हो तो एक-दो चम्मच गुनगुना पानी मिला सकते हैं।
- पूजा के लिए बना रहे हों तो अपने परिवार की शुद्धता और भोग संबंधी परंपराओं का पालन करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या करम और करमा पूजा एक ही हैं?
हां। अलग-अलग क्षेत्रों में इसे करम पर्व, करम परब, करमा पूजा और कर्मा पूजा कहा जाता है।
करमा पूजा किस देवता की होती है?
इस दिन करम देवता या करम गोसाईं की पूजा की जाती है। उन्हें शक्ति, यौवन, खेती, समृद्धि और खुशहाली से जुड़ा माना जाता है।
जावा क्या होता है?
टोकरी में बोए गए अनाज के छोटे-छोटे अंकुर जावा कहलाते हैं। ये उर्वरता, अच्छी फसल और जीवन के विकास का प्रतीक माने जाते हैं।
क्या करमा पूजा घर में की जा सकती है?
कई परिवार घर में पूजा करते हैं, लेकिन करम पर्व मूल रूप से सामूहिक उत्सव है। पूजा-विधि के लिए स्थानीय पाहन, बुजुर्ग या परंपरा के जानकार व्यक्ति का मार्गदर्शन लेना बेहतर है।
करमा पूजा का प्रमुख प्रसाद क्या है?
चूड़ा, गुड़, चना, खीरा और मौसमी फल प्रमुख प्रसाद माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त स्थानीय परंपरा के अनुसार चिल्का रोटी, अरसा, पिठा या धुस्का बनाया जा सकता है।
निष्कर्ष
करमा पूजा हमें याद दिलाती है कि मनुष्य का जीवन पेड़-पौधों, जल, मिट्टी और खेती से जुड़ा हुआ है। करम डाल की पूजा, जावा के अंकुर, मांदर की आवाज और सामूहिक नृत्य मिलकर इस पर्व को जीवंत बनाते हैं। यह उत्सव केवल खुशहाली की कामना नहीं करता, बल्कि मेहनत, प्रकृति के सम्मान और समाज के साथ मिलकर रहने की सीख भी देता है।