मेटा विवरण: जानिए जितिया पर्व का संक्षिप्त इतिहास, यह कहां मनाया जाता है, व्रत की धार्मिक मान्यता और मड़ुआ की रोटी व नोनी साग बनाने की पारंपरिक विधि।
जितिया का नाम आते ही बिहार और झारखंड के घरों में नहाय-खाय की तैयारी, मड़ुआ के आटे की खुशबू और नोनी साग का स्वाद याद आने लगता है। यह केवल एक व्रत नहीं, बल्कि मां और संतान के रिश्ते से जुड़ा लोकपर्व है। इसे जीवित्पुत्रिका व्रत, जिउतिया या जीमूतवाहन व्रत भी कहा जाता है।
इस लेख में जितिया का छोटा-सा इतिहास, इसे मनाने वाले प्रमुख क्षेत्र, व्रत से जुड़ी मान्यता और नहाय-खाय में बनने वाली मड़ुआ की रोटी तथा नोनी साग की आसान घरेलू रेसिपी दी गई है।
जितिया पर्व कब और कहां मनाया जाता है?
जितिया हर साल हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। आमतौर पर इसकी परंपरा तीन दिनों में पूरी होती है:
पहले दिन नहाय-खाय होता है। व्रती स्नान करके शुद्ध और सात्त्विक भोजन ग्रहण करती हैं।
दूसरे दिन अष्टमी को मुख्य व्रत रखा जाता है। कई महिलाएं अपनी परंपरा के अनुसार निर्जला उपवास करती हैं और जितिया व्रत कथा सुनती हैं।
तीसरे दिन निर्धारित समय पर पूजा के बाद पारण किया जाता है।
यह पर्व विशेष रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है। नेपाल के तराई और मिथिला क्षेत्र में भी इसकी गहरी परंपरा है। पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों और देश के दूसरे शहरों में रहने वाले इन क्षेत्रों के परिवार भी जितिया मनाते हैं। अलग-अलग जिलों में पूजा, नहाय-खाय और पारण के भोजन में थोड़ा अंतर मिल सकता है।
जितिया पर्व का संक्षिप्त इतिहास
जितिया से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा राजा जीमूतवाहन की है। धार्मिक कथा के अनुसार जीमूतवाहन बहुत दयालु और त्यागी राजा थे। उन्हें पता चला कि पक्षीराज गरुड़ के भोजन के लिए नाग परिवारों को बारी-बारी से अपना एक सदस्य भेजना पड़ता है। एक दिन शंखचूड़ नाम के नाग की बारी आई। उसकी मां को दुखी देखकर जीमूतवाहन ने नाग के स्थान पर स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दिया।
उनका त्याग देखकर गरुड़ प्रभावित हुए। उन्होंने नागों को न मारने का वचन दिया और कथा के अनुसार पहले मारे गए नागों को भी जीवनदान मिला। इस प्रसंग में जीमूतवाहन का साहस, करुणा और दूसरे के जीवन की रक्षा के लिए किया गया त्याग सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी कारण जितिया के दिन जीमूतवाहन की पूजा और कथा सुनने की परंपरा बनी।
बिहार और झारखंड के कई क्षेत्रों में जितिया के अवसर पर चील और सियारिन की लोककथा भी सुनाई जाती है। कथा का रूप स्थान के अनुसार थोड़ा बदल सकता है, लेकिन इसका संदेश संयम, नियम और संतान के प्रति जिम्मेदारी से जुड़ा रहता है।
जितिया व्रत करने से क्या फल मिलता है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार माताएं यह व्रत अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुरक्षा, सुख और समृद्धि की कामना से करती हैं। यह पर्व मां के प्रेम, त्याग, धैर्य और परिवार के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
यहां “फल” से आशय धार्मिक आस्था और मनोकामना से है, किसी निश्चित या चिकित्सकीय परिणाम की गारंटी से नहीं। परिवार की परंपरा और व्रती के स्वास्थ्य को हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए। निर्जला व्रत कठिन हो सकता है; गर्भावस्था, मधुमेह, कमजोरी या किसी बीमारी की स्थिति में डॉक्टर की सलाह लेना उचित है।
जितिया में मड़ुआ की रोटी और नोनी साग का महत्व

मड़ुआ यानी रागी या फिंगर मिलेट और नोनी साग बिहार-झारखंड के पुराने स्थानीय भोजन का हिस्सा रहे हैं। नोनी को अंग्रेजी में purslane कहा जाता है। इसकी पत्तियां और कोमल डंठल पकाए जाते हैं और इसका स्वाद हल्का खट्टा होता है।
जितिया के नहाय-खाय में कई परिवार मड़ुआ की रोटी और नोनी का साग बनाते हैं। भोजन आमतौर पर सात्त्विक रखा जाता है, इसलिए नीचे दी गई रेसिपी में प्याज और लहसुन का इस्तेमाल नहीं किया गया है। नमक, तेल और मसालों के संबंध में अपने परिवार की परंपरा को प्राथमिकता दें।
मड़ुआ की रोटी बनाने की रेसिपी
तैयारी का समय: 15 मिनट
पकाने का समय: 20 मिनट
मात्रा: लगभग 8 मध्यम रोटियां
आवश्यक सामग्री
मड़ुआ या रागी का आटा – 2 कप
गेहूं का आटा – ½ कप, वैकल्पिक
नमक – ½ छोटा चम्मच या परंपरा के अनुसार
गुनगुना से हल्का गर्म पानी – जरूरत के अनुसार
घी – रोटी पर लगाने के लिए, वैकल्पिक
शुद्ध मड़ुआ आटे में लचक कम होती है, इसलिए रोटी बेलना थोड़ा कठिन हो सकता है। पहली बार बना रहे हैं तो थोड़ा गेहूं का आटा मिलाने से रोटी आसानी से बनेगी। बिना गेहूं वाली पारंपरिक रोटी को हाथ से थपथपाकर बनाया जाता है।
बनाने की विधि
एक बड़े बर्तन में मड़ुआ का आटा और नमक डालकर मिला लें। गेहूं का आटा इस्तेमाल करना हो तो इसी समय मिला दें।
थोड़ा-थोड़ा गर्म पानी डालें। पहले चम्मच से मिलाएं, फिर जब मिश्रण हाथ से छूने लायक हो जाए तो नरम आटा गूंथ लें। सारा पानी एक साथ न डालें।
आटे को ढककर 8 से 10 मिनट रख दें। इससे आटा पानी को अच्छी तरह सोख लेगा।
तवा मध्यम आंच पर गर्म करें। आटे की मध्यम आकार की लोई बनाएं।
यदि आटे में गेहूं मिलाया है तो सूखा आटा लगाकर रोटी की तरह बेल लें। शुद्ध मड़ुआ की रोटी बनानी हो तो गीली हथेली, केले के पत्ते, बटर पेपर या साफ प्लास्टिक शीट पर लोई को धीरे-धीरे थपथपाकर गोल करें।
रोटी को सावधानी से गर्म तवे पर डालें। एक तरफ हल्के बुलबुले आने लगें तो पलट दें।
दोनों तरफ से अच्छी तरह सेंकें। चाहें तो थोड़ा घी लगाएं। तैयार रोटी को कपड़े में ढककर रखें और गर्म ही परोसें।
नोनी का साग बनाने की रेसिपी
तैयारी का समय: 15 मिनट
पकाने का समय: 15–20 मिनट
मात्रा: 4 लोगों के लिए
आवश्यक सामग्री
ताजा नोनी साग – 500 ग्राम
सरसों का तेल या घी – 1 से 1½ बड़ा चम्मच
जीरा – ½ छोटा चम्मच
सूखी लाल मिर्च – 1 या 2
हींग – 1 चुटकी
हल्दी पाउडर – ¼ छोटा चम्मच, वैकल्पिक
हरी मिर्च – 1, बीच से कटी हुई; वैकल्पिक
नमक या सेंधा नमक – स्वाद और पारिवारिक नियम के अनुसार
साग साफ करने का सही तरीका
नोनी साग जमीन के पास फैलकर उगता है, इसलिए इसमें मिट्टी अधिक हो सकती है। सबसे पहले जड़ और बहुत मोटे डंठल हटा दें। पत्तियों और कोमल डंठलों को पानी से भरे बड़े बर्तन में डालकर धोएं। पानी बदलते हुए तीन से चार बार धोना बेहतर रहता है। साफ होने के बाद पानी निकालें और साग को मोटा-मोटा काट लें।
बनाने की विधि
कड़ाही गर्म करके उसमें सरसों का तेल डालें। तेल अच्छी तरह गर्म हो जाए तो आंच धीमी कर दें। घी इस्तेमाल कर रहे हैं तो उसे केवल पिघलाना पर्याप्त है।
जीरा, सूखी लाल मिर्च और एक चुटकी हींग डालें। जीरा चटकने पर हरी मिर्च डाल सकते हैं।
अब कटा हुआ नोनी साग डालें। हल्दी और नमक मिलाकर एक-दो मिनट चलाएं।
कड़ाही को ढककर धीमी आंच पर लगभग पांच मिनट पकाएं। साग अपने आप पानी छोड़ेगा, इसलिए शुरुआत में अलग से पानी डालने की जरूरत नहीं होती।
ढक्कन हटाकर मध्यम आंच पर पकाएं। बीच-बीच में चलाते रहें, ताकि साग तले में न लगे।
जब साग नरम हो जाए और अतिरिक्त पानी सूख जाए तो गैस बंद कर दें। नोनी का अपना हल्का खट्टापन होता है, इसलिए पहले चखे बिना नींबू या अमचूर न डालें।
दोनों को कैसे परोसें?
गर्म मड़ुआ रोटी पर थोड़ा घी लगाएं और साथ में नोनी साग परोसें। नहाय-खाय की थाली में परिवार की परंपरा के अनुसार सतपुतिया या तोरई की सब्जी, चना दाल, चावल, अरबी और मौसमी सब्जियां भी रखी जा सकती हैं।
यदि भोजन पूजा या भोग के लिए बनाया जा रहा है तो रसोई और बर्तनों की सफाई का ध्यान रखें और भोग लगाने से पहले भोजन न चखें। यह नियम भी परिवार के अनुसार अलग हो सकता है।
रेसिपी से जुड़ी जरूरी बातें
नोनी साग किसी भरोसेमंद सब्जी विक्रेता से ही लें। बिना सही पहचान के जंगली पत्तियां न तोड़ें।
साग को कई बार धोना जरूरी है, क्योंकि इसकी जड़ों और डंठलों के पास मिट्टी रहती है।
मड़ुआ रोटी गर्म खाने में सबसे अच्छी लगती है। ठंडी होने पर यह थोड़ी सूखी हो सकती है।
शुद्ध मड़ुआ रोटी टूटे तो घबराएं नहीं। आटे को थोड़ा अधिक गीला रखें और हाथ से थपथपाकर बनाएं।
प्याज-लहसुन, सामान्य नमक या सेंधा नमक का चुनाव अपने घर के नहाय-खाय के नियम के अनुसार करें।
निष्कर्ष
जितिया पर्व में व्रत और पूजा के साथ भोजन की परंपरा भी परिवारों को अपनी मिट्टी और पुरानी स्मृतियों से जोड़ती है। मड़ुआ की सादी रोटी और हल्के खट्टे स्वाद वाला नोनी साग इसी परंपरा का हिस्सा हैं। सामग्री कम है और विधि भी कठिन नहीं, लेकिन इसका असली स्वाद साफ-सफाई, धैर्य और घर की परंपरा के अनुसार बनाने में है।