मेटा विवरण: जितिया के नहाय-खाय में सतपुतिया का क्या महत्व है और छोटी कोमल तोरई से बिना प्याज-लहसुन की पारंपरिक सब्जी कैसे बनाएं? जानिए आसान विधि।
जितिया की पहचान अक्सर उसके कठिन निर्जला व्रत से की जाती है, लेकिन इस पर्व का एक बहुत घरेलू और आत्मीय रूप रसोई में भी दिखाई देता है। नहाय-खाय के दिन बनने वाला सादा भोजन, आंगन या खेत से आई मौसमी सब्जियां और परिवार के बड़े-बुजुर्गों से सीखी गई विधियां—ये सब मिलकर जितिया को खास बनाते हैं।
इसी पारंपरिक थाली में सतपुतिया की सब्जी का अपना स्थान है। सतपुतिया छोटी और कोमल तोरई या झिंगनी की स्थानीय किस्म मानी जाती है। बिहार और झारखंड के कई हिस्सों में इसे जितिया के नहाय-खाय या पारण के भोजन में बनाया जाता है। इसका स्वाद हल्का होता है, इसलिए इसे बहुत अधिक मसालों की जरूरत नहीं पड़ती। सरसों के तेल, जीरा, हल्दी और थोड़ी-सी हींग में बनी इसकी सादी सब्जी गरम चावल, दाल या मड़ुआ की रोटी के साथ खूब अच्छी लगती है।
जितिया: उपवास के साथ घर और परंपरा का पर्व
जितिया को जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। यह आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से जुड़ा तीन दिनों का पर्व है। पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन मुख्य व्रत और अगले दिन पारण किया जाता है। यह परंपरा मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ भागों में प्रचलित है।
लोक-मान्यता के अनुसार माताएं संतान के अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुखमय जीवन की कामना से यह व्रत करती हैं। इस भावना को किसी निश्चित फल की गारंटी की तरह नहीं, परिवार की मंगल-कामना और आस्था के रूप में समझना अधिक उचित है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा, नहाय-खाय तथा पारण के नियम कुछ बदल सकते हैं। इसलिए अपने घर की पुरानी परंपरा को प्राथमिकता देना चाहिए।
नहाय-खाय का भोजन दिखने में साधारण होता है, मगर उसके पीछे मौसम और स्थानीय खेती की साफ झलक मिलती है। मड़ुआ, नोनी साग, अरबी, देसी मटर और छोटी तोरई जैसी चीजें गांव की रसोई से सहज रूप से जुड़ी रही हैं। यही कारण है कि जितिया की थाली केवल व्रत का भोजन नहीं लगती; वह अपने इलाके की मिट्टी, उपज और पारिवारिक स्मृतियों से भी परिचय कराती है।
सतपुतिया क्या होती है?
सतपुतिया को कई जगह छोटी तोरई, झिंगनी या झिंगी के नाम से पहचाना जाता है। आमतौर पर इसके फल सामान्य तोरई से छोटे, पतले और कोमल होते हैं। नाम और किस्म की पहचान जगह के अनुसार बदल सकती है। अगर बाजार में सतपुतिया नाम से सब्जी न मिले, तो ताजी और छोटी कोमल तोरई से यही विधि अपनाई जा सकती है।
जितिया में इसका महत्व केवल स्वाद तक सीमित नहीं है। कुछ स्थानीय परंपराओं में सतपुतिया के पत्तों का उपयोग पूजा और प्रसाद अर्पित करने में भी किया जाता है। कई परिवार इसे नहाय-खाय या पारण की थाली में रखते हैं, जबकि कुछ घरों में दूसरी स्थानीय सब्जियां बनाई जाती हैं। इसलिए इसे पूरे क्षेत्र के लिए एक जैसा अनिवार्य नियम मानने के बजाय पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपरा के रूप में देखना ठीक रहेगा।
ध्यान रहे कि मुख्य निर्जला व्रत के समय भोजन नहीं किया जाता। नीचे दी गई सब्जी नहाय-खाय या पारण की थाली के लिए है। इसे किस दिन बनाना है, यह अपने घर के नियम के अनुसार तय करें।
सतपुतिया यानी छोटी तोरई की सादी सब्जी
तैयारी का समय: 15 मिनट
पकाने का समय: 20 मिनट
कुल समय: लगभग 35 मिनट
मात्रा: 4 लोगों के लिए

आवश्यक सामग्री
सतपुतिया या छोटी कोमल तोरई – 500 ग्राम
आलू – 1 मध्यम आकार का, वैकल्पिक
सरसों का तेल – 1½ बड़ा चम्मच
जीरा – ½ छोटा चम्मच
हींग – 1 चुटकी
सूखी लाल मिर्च – 1
हल्दी पाउडर – ½ छोटा चम्मच
धनिया पाउडर – ½ छोटा चम्मच, वैकल्पिक
नमक – स्वादानुसार और घर की व्रत-परंपरा के अनुसार
पानी – जरूरत पड़ने पर 2 से 3 बड़े चम्मच
हरा धनिया – थोड़ा-सा, वैकल्पिक
सब्जी बनाने से पहले तैयारी
सतपुतिया को साफ पानी से दो-तीन बार धो लें, क्योंकि इसकी सतह की धारियों में मिट्टी रह सकती है। अब चाकू से केवल ऊपरी खुरदुरी परत को हल्के हाथ से खुरचें। इसे मोटा छीलने की जरूरत नहीं है। दोनों सिरे हटाकर छोटे गोल टुकड़े या लगभग एक इंच के टुकड़े काट लें।
यदि आलू डाल रहे हैं, तो उसे छीलकर छोटे टुकड़ों में काटें। छोटे टुकड़े रखने से आलू और तोरई एक साथ पक जाते हैं। बिना आलू के भी यह सब्जी स्वादिष्ट बनती है और उसका पारंपरिक हल्का स्वाद अधिक साफ महसूस होता है।
बनाने की विधि
कड़ाही में सरसों का तेल डालकर मध्यम आंच पर गरम करें। तेल अच्छी तरह गरम हो जाए तो आंच हल्की कर दें।
इसमें जीरा डालें। जीरा चटकने लगे तो हींग और सूखी लाल मिर्च डालकर कुछ सेकंड चलाएं। मिर्च को जलने न दें।
यदि आलू इस्तेमाल कर रहे हैं, तो उसे पहले कड़ाही में डालें और मध्यम आंच पर 3 से 4 मिनट भूनें। केवल तोरई की सब्जी बना रहे हैं तो सीधे अगला चरण करें।
अब कटी हुई सतपुतिया डालें। साथ में हल्दी, नमक और चाहें तो थोड़ा धनिया पाउडर मिलाएं। सब्जी को 2 मिनट खुला चलाते हुए पकाएं, ताकि मसाले सभी टुकड़ों पर लग जाएं।
कड़ाही को ढककर धीमी आंच पर 10 से 12 मिनट पकाएं। छोटी तोरई पकते समय अपना पानी छोड़ती है, इसलिए शुरुआत में अलग से पानी न डालें। बीच में एक-दो बार ढक्कन खोलकर हल्के हाथ से चला दें।
तोरई नरम होने लगे और आलू लगभग पक जाए तो ढक्कन हटा दें। यदि सब्जी बहुत सूखी लगे, तभी 2 से 3 बड़े चम्मच पानी डालें। फिर 4 से 5 मिनट पकाएं।
जब आलू पूरी तरह नरम हो जाए और तोरई गलने के बजाय अपना आकार बनाए रखे, तब गैस बंद कर दें। चाहें तो ऊपर से थोड़ा हरा धनिया डालें।
इस सब्जी में गरम मसाला, टमाटर या बहुत ज्यादा मिर्च डालने की जरूरत नहीं है। इसकी खासियत ही इसका हल्का, देसी स्वाद है।
स्वाद अच्छा रखने के छोटे उपाय
बाजार से छोटी, ताजी और मुलायम तोरई चुनें। बहुत मोटी या ज्यादा पकी तोरई में बीज सख्त हो सकते हैं।
छिलका पूरी तरह उतारने के बजाय हल्का खुरचें। इससे सब्जी पकने के बाद बिल्कुल घुलती नहीं है।
पानी बहुत कम डालें। सतपुतिया अपने रस में धीमी आंच पर पकती है तो स्वाद बेहतर रहता है।
सब्जी को बार-बार तेज हाथ से न चलाएं, वरना कोमल टुकड़े टूट सकते हैं।
पर्व के भोजन के लिए प्याज और लहसुन न डालने वाली यह विधि उपयुक्त है। फिर भी मसाले और नमक के बारे में अपने परिवार की परंपरा का पालन करें।
किसके साथ परोसें?
सतपुतिया की सब्जी गरम चावल और सादी दाल के साथ सबसे सहज लगती है। नहाय-खाय की पारंपरिक थाली में घर के नियम के अनुसार मड़ुआ की रोटी, नोनी का साग, अरबी या दूसरी मौसमी सब्जी भी रखी जा सकती है। पारण में इसे पूरी, चावल या दाल के साथ परोसा जा सकता है।
अगर पहली बार बना रहे हैं तो सब्जी को बहुत मसालेदार करने की कोशिश न करें। जितिया की थाली का स्वाद अलग-अलग व्यंजनों के मेल से बनता है; किसी एक सब्जी को तीखा या भारी बनाना जरूरी नहीं है।
आखिर में
जितिया के भोजन की खूबसूरती उसकी सादगी में है। यहां महंगे या दुर्लभ पकवानों से अधिक महत्व उन चीजों का है जो मौसम, खेत और घर की परंपरा से जुड़ी हों। सतपुतिया की सब्जी उसी सादगी का अच्छा उदाहरण है—कम सामग्री, आसान विधि और परिचित देसी स्वाद।
आपके यहां इसे सतपुतिया, झिंगनी, झिंगी या छोटी तोरई किस नाम से बुलाया जाता है? और जितिया के नहाय-खाय में इसके साथ कौन-सी दूसरी सब्जी बनती है? पाठकों से यह सवाल पूछना लेख को स्थानीय अनुभवों से और समृद्ध कर सकता है।
नोट: जितिया के नियम और भोजन क्षेत्र तथा कुल-परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं। यह लेख सामान्य जानकारी और घरेलू रेसिपी के लिए है; पूजा-विधि के मामले में परिवार के बुजुर्ग या स्थानीय जानकार की परंपरा को प्राथमिकता दें।