मेटा विवरण: छठ पूजा 2026 कब है, इसका इतिहास और चार दिनों की पूरी विधि क्या है? जानिए नहाय-खाय से उषा अर्घ्य तक की परंपरा और ठेकुआ प्रसाद बनाने की आसान रेसिपी।
नदी या तालाब के शांत पानी में खड़े व्रती, हाथ में अर्घ्य का लोटा, सामने डूबता सूर्य और घाट पर गूंजते छठी मईया के गीत—छठ पूजा की यही तस्वीर सबसे पहले मन में आती है। बिहार और झारखंड से गहरा जुड़ाव रखने वाला यह पर्व अब देश के अनेक शहरों में उसी श्रद्धा से मनाया जाता है। लोग जहां भी बसे, अपने साथ बांस का सूप, ठेकुआ की खुशबू और घाट की सामूहिक परंपरा भी ले गए।
छठ केवल एक दिन की पूजा नहीं है। यह चार दिनों तक चलने वाला अनुशासित पर्व है, जिसमें स्वच्छता, सात्विक भोजन, उपवास, प्रसाद और सूर्य को अर्घ्य देने की पूरी प्रक्रिया शामिल होती है। इसकी एक खास बात यह है कि इसमें पहले अस्त होते सूर्य और अगली सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। डूबते और उगते—जीवन के दोनों रूपों के प्रति सम्मान का यह भाव छठ को अलग पहचान देता है।
छठ पूजा कब मनाई जाती है?
मुख्य छठ पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाती है। दीपावली के बाद आने वाली इस पूजा को कार्तिकी छठ, सूर्य षष्ठी, डाला छठ या छठ पर्व भी कहा जाता है। चैत्र महीने में मनाई जाने वाली चैती छठ की परंपरा भी है, लेकिन कार्तिक छठ का आयोजन अधिक व्यापक रूप से होता है।
छठ पूजा 2026 की तारीखें
| दिन | तारीख | प्रमुख अनुष्ठान |
|---|---|---|
| पहला दिन | शुक्रवार, 13 नवंबर 2026 | नहाय-खाय |
| दूसरा दिन | शनिवार, 14 नवंबर 2026 | लोहंडा और खरना |
| तीसरा दिन | रविवार, 15 नवंबर 2026 | छठ पूजा और संध्या अर्घ्य |
| चौथा दिन | सोमवार, 16 नवंबर 2026 | उषा अर्घ्य और पारण |
सूर्योदय और सूर्यास्त का समय शहर के अनुसार बदलता है। अर्घ्य का स्थानीय समय जानने के लिए अपने शहर का पंचांग या स्थानीय प्रशासन की सूचना अवश्य देखें। किसी दूसरे शहर का समय देखकर पूजा की योजना न बनाएं।
छठ पूजा का इतिहास
छठ की शुरुआत किसी एक घटना या एक निश्चित वर्ष से हुई, ऐसा प्रमाणित इतिहास उपलब्ध नहीं है। सूर्य उपासना की परंपरा भारत में बहुत प्राचीन है और वैदिक साहित्य में सूर्य तथा उषा की स्तुति मिलती है। समय के साथ पूर्वी भारत की लोक-परंपराओं, नदी-संस्कृति और पारिवारिक व्रत ने मिलकर छठ को आज का रूप दिया। इसलिए इसे प्राचीन सूर्य उपासना और बिहार-पूर्वांचल की जीवित लोक-संस्कृति—दोनों के रूप में समझना उचित है।
छठ नाम का संबंध षष्ठी, यानी चंद्र मास की छठी तिथि से माना जाता है। पूजा सूर्य देव को समर्पित होती है, जबकि लोक-आस्था में छठी मईया की आराधना भी की जाती है। कई परिवार छठी मईया को संतान और परिवार की रक्षा करने वाली मातृशक्ति के रूप में पूजते हैं।
छठ से जुड़ी लोकप्रिय धार्मिक कथाएं
छठ के साथ रामायण और महाभारत की कई कथाएं सुनाई जाती हैं। इन्हें प्रमाणित इतिहास के बजाय धार्मिक मान्यता और लोककथा के रूप में पढ़ना चाहिए।
- कर्ण की सूर्य उपासना: महाभारत के वीर कर्ण को सूर्य पुत्र कहा गया है। लोककथा के अनुसार वे जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते थे। इस कथा को छठ की प्राचीन सूर्य आराधना से जोड़ा जाता है।
- द्रौपदी और पांडव: एक मान्यता है कि कठिन समय से निकलने और राज्य वापस पाने की कामना से द्रौपदी तथा पांडवों ने सूर्य उपासना की थी।
- श्रीराम और माता सीता: कुछ लोक-परंपराओं में बताया जाता है कि अयोध्या लौटने के बाद श्रीराम और माता सीता ने सूर्य देव की आराधना की।
इन कथाओं की विधियां अलग-अलग स्थानों पर थोड़ी बदलकर सुनाई जाती हैं। छठ की वास्तविक सांस्कृतिक शक्ति आज भी उसके सामूहिक घाट, पारिवारिक अनुशासन और पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक परंपरा में दिखाई देती है।
छठ पूजा कहां मनाई जाती है?
छठ पूजा का सबसे गहरा संबंध बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश से है। नेपाल के तराई क्षेत्र में भी इसे व्यापक रूप से मनाया जाता है। रोजगार और शिक्षा के लिए इन क्षेत्रों से लोग देश के दूसरे भागों में गए तो छठ भी दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, सूरत, बेंगलुरु और अनेक बड़े शहरों तक पहुंच गया।
आज प्राकृतिक नदी या तालाब उपलब्ध न होने पर कई स्थानों पर स्वच्छ कृत्रिम घाट और छोटे जलकुंड बनाए जाते हैं। पूजा का स्थान बदल सकता है, लेकिन स्वच्छता, सामूहिक सहयोग और सूर्य को अर्घ्य देने की मूल भावना बनी रहती है।
छठ पूजा के चार दिनों की पूरी विधि
पूजा की सूक्ष्म विधि और प्रसाद परिवार तथा क्षेत्र के अनुसार बदल सकते हैं। नीचे छठ के चारों दिनों का सामान्य क्रम दिया गया है।
पहला दिन: नहाय-खाय
छठ की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। घर और रसोई की अच्छी तरह सफाई की जाती है। व्रती स्नान करके सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। कई बिहारी परिवारों में इस दिन अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू की सब्जी बनाई जाती है। भोजन की तैयारी में शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
नहाय-खाय का उद्देश्य शरीर और घर—दोनों को आगे के कठिन व्रत के लिए तैयार करना माना जाता है। किस तेल, नमक या बर्तन का उपयोग करना है, इसके नियम घर की परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं।
दूसरा दिन: खरना या लोहंडा
दूसरे दिन व्रती दिनभर उपवास रखते हैं। शाम को पूजा के बाद गुड़ और चावल की खीर, रोटी तथा फल का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इसे खरना का प्रसाद कहा जाता है। व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं और फिर लगभग 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है।
खरना का प्रसाद परिवार और पड़ोस में श्रद्धा से बांटा जाता है। इसे बनाते समय रसोई की स्वच्छता तथा पूजा के पारंपरिक नियमों का ध्यान रखा जाता है।
तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य
तीसरे दिन घर में ठेकुआ, कसार और दूसरे प्रसाद तैयार किए जाते हैं। बांस के सूप या डाला में नारियल, केला, मौसमी फल, गन्ना, ठेकुआ, दीपक और पूजा की अन्य सामग्री सजाई जाती है। शाम को परिवार के लोग प्रसाद लेकर घाट पहुंचते हैं।
व्रती जल में खड़े होकर अस्त होते सूर्य को दूध या जल से अर्घ्य देते हैं। छठ गीत, दीपक और सजे हुए घाट इस समय पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं। कुछ परिवारों में रात को गन्ने से कोसी बनाकर उसके नीचे दीप जलाने की परंपरा भी होती है।
चौथा दिन: उषा अर्घ्य और पारण
चौथे दिन सूर्योदय से पहले परिवार फिर घाट पहुंचता है। व्रती उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं और परिवार की मंगल-कामना करते हैं। पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद बांटा जाता है तथा व्रती पारण करके उपवास समाप्त करते हैं।
अस्त होते सूर्य के बाद उगते सूर्य को अर्घ्य देना छठ का महत्वपूर्ण क्रम है। इसे कठिन समय और नई शुरुआत—दोनों के प्रति विनम्रता के भाव से भी देखा जाता है। यह एक सांस्कृतिक व्याख्या है; अलग परिवार इसका धार्मिक अर्थ अपनी परंपरा के अनुसार बताते हैं।
छठ पूजा से क्या फल मिलता है?
लोक-मान्यता के अनुसार छठ व्रत परिवार के स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि, संतान की मंगल-कामना और मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है। बहुत-से परिवार किसी कठिन समय से निकलने या मनौती पूरी होने पर भी छठ व्रत आरंभ करते हैं।
इन बातों को आस्था और धार्मिक विश्वास के रूप में ही समझना चाहिए, किसी निश्चित परिणाम या बीमारी के उपचार की गारंटी के रूप में नहीं। व्यवहारिक रूप से यह पर्व अनुशासन, स्वच्छता, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और पूरे परिवार के सहयोग का भाव मजबूत करता है।
छठ पूजा में ठेकुआ का महत्व
ठेकुआ छठ के सबसे पहचाने जाने वाले प्रसादों में से एक है। बिहार में इसे खजूरिया या खजूर जैसे स्थानीय नामों से भी पुकारा जाता है। गेहूं के आटे, गुड़ और घी से तैयार यह प्रसाद जल्दी खराब नहीं होता और बांस के सूप में दूसरे फलों के साथ आसानी से रखा जा सकता है।
पारंपरिक ठेकुआ को लकड़ी के सांचे पर दबाकर सुंदर आकृति दी जाती है। सांचा न हो तो हाथ से गोल या अंडाकार आकार बनाकर कांटे अथवा चाकू की मदद से हल्का डिजाइन बनाया जा सकता है। पूजा के प्रसाद के लिए सामग्री और बर्तन संबंधी अपने घर के नियमों का पालन करें।
छठ स्पेशल गुड़ वाला ठेकुआ बनाने की विधि
तैयारी का समय: 25 मिनट
पकाने का समय: 30 मिनट
मात्रा: लगभग 18 से 22 ठेकुआ
आवश्यक सामग्री
- गेहूं का आटा – 500 ग्राम
- गुड़ – 250 ग्राम
- घी – 4 बड़े चम्मच, मोयन के लिए
- सूखा नारियल – ½ कप, कद्दूकस किया हुआ
- सौंफ – 2 छोटे चम्मच
- छोटी इलायची पाउडर – ½ छोटा चम्मच
- पानी – लगभग ½ कप या जरूरत के अनुसार
- घी या साफ खाद्य तेल – तलने के लिए, घर की परंपरा के अनुसार
गुड़ का घोल तैयार करें
गुड़ को छोटे टुकड़ों में तोड़ या कद्दूकस कर लें। पैन में लगभग आधा कप पानी हल्का गरम करें और उसमें गुड़ डालें। धीमी आंच पर केवल इतना गरम करें कि गुड़ पूरी तरह घुल जाए। इसे उबालकर गाढ़ी चाशनी नहीं बनानी है।
गुड़ का घोल छान लें, ताकि कोई अशुद्धि हो तो निकल जाए। आटा गूंथने से पहले घोल को सामान्य या हल्का गुनगुना होने दें। बहुत गरम घोल डालने से आटे की बनावट खराब हो सकती है।
ठेकुआ बनाने की विधि
- बड़े बर्तन में गेहूं का आटा, कद्दूकस किया नारियल, सौंफ और इलायची पाउडर मिलाएं।
- इसमें चार बड़े चम्मच घी डालें। दोनों हथेलियों के बीच आटे को रगड़ते हुए घी अच्छी तरह मिलाएं। मुट्ठी में दबाने पर आटा हल्का आकार पकड़ने लगे तो मोयन पर्याप्त है।
- गुड़ का घोल थोड़ा-थोड़ा डालते हुए सख्त आटा गूंथें। पूरी मात्रा एक साथ न डालें। ठेकुआ का आटा रोटी के आटे से सख्त होना चाहिए, वरना तलते समय आकार बिगड़ सकता है।
- आटे को ढककर लगभग 10 मिनट रखें। बहुत देर तक न छोड़ें, क्योंकि गुड़ नमी छोड़कर आटे को नरम कर सकता है।
- आटे की छोटी लोइयां बनाएं। प्रत्येक लोई को ठेकुआ के सांचे पर दबाकर निकालें। सांचा न हो तो हथेली से चपटा करके ऊपर हल्की रेखाएं बना दें। ठेकुआ न बहुत पतला हो और न बहुत मोटा।
- कड़ाही में घी या तेल को मध्यम आंच पर गरम करें। तेल तेज धुआं देने जितना गरम नहीं होना चाहिए। आटे का छोटा टुकड़ा डालने पर वह धीरे-धीरे ऊपर आए तो तापमान ठीक है।
- एक बार में थोड़े ठेकुआ डालें और धीमी से मध्यम आंच पर तलें। बार-बार न पलटें। एक तरफ रंग आने के बाद पलटकर दोनों ओर से गहरा सुनहरा होने तक पकाएं।
- तैयार ठेकुआ को छलनी या साफ प्लेट पर निकालें। पूरी तरह ठंडा होने पर वह कुरकुरा होगा। पूजा के लिए रखने से पहले उसे अच्छी तरह ठंडा कर लें।
ठेकुआ बनाते समय इन गलतियों से बचें
- आटा मुलायम न रखें: मुलायम आटा तेल में फैल सकता है और डिजाइन मिट जाएगा।
- गुड़ का गरम घोल न डालें: घोल हल्का गुनगुना या सामान्य तापमान पर होना चाहिए।
- तेज आंच पर न तलें: बाहर का रंग जल्दी गहरा हो जाएगा, लेकिन अंदर आटा कच्चा रह सकता है।
- कड़ाही में भीड़ न लगाएं: बहुत सारे ठेकुआ एक साथ डालने से तेल का तापमान अचानक गिर जाता है।
- गरम ठेकुआ बंद डिब्बे में न रखें: भाप के कारण वह नरम हो सकता है। पहले पूरी तरह ठंडा होने दें।
छठ की तैयारी में उपयोगी सावधानियां
- घाट पर केवल प्रशासन द्वारा सुरक्षित घोषित स्थान पर ही जाएं। गहरे या तेज बहाव वाले पानी में प्रवेश न करें।
- बच्चों और बुजुर्गों को पानी के पास अकेला न छोड़ें।
- पूजा सामग्री के प्लास्टिक पैकेट, कपड़े या कचरे को नदी-तालाब में न डालें।
- मधुमेह, गर्भावस्था या दूसरी स्वास्थ्य समस्या वाले व्यक्ति कठिन निर्जला व्रत से पहले चिकित्सकीय सलाह लें।
- पूजा की सामग्री, प्रसाद और व्रत के नियमों में परिवार की परंपरा को प्राथमिकता दें।
आखिर में

छठ पूजा की भव्यता बड़े सजावटी पंडाल से नहीं, बल्कि साधारण बांस के सूप, घर में बने प्रसाद, स्वच्छ घाट और व्रती के अनुशासन से बनती है। डूबते सूर्य को धन्यवाद देना और अगली सुबह उगते सूर्य का स्वागत करना इस पर्व को गहरा मानवीय अर्थ देता है।
ठेकुआ की यह रेसिपी सामान्य घरेलू मात्रा के अनुसार दी गई है। पूजा के लिए अधिक प्रसाद बनाना हो तो सामग्री उसी अनुपात में बढ़ाई जा सकती है। आपके घर में ठेकुआ गुड़ से बनता है या चीनी से, और उसमें नारियल डाला जाता है या नहीं? लेख के अंत में पाठकों से यह सवाल पूछना अलग-अलग क्षेत्रीय विधियों को सामने ला सकता है।
नोट: पूजा-विधि, प्रसाद और व्रत के नियम क्षेत्र तथा कुल-परंपरा के अनुसार बदल सकते हैं। यह लेख सामान्य सांस्कृतिक जानकारी और घरेलू रेसिपी के लिए है। स्थानीय परंपरा के लिए परिवार के बुजुर्ग या जानकार व्यक्ति का मार्गदर्शन लें।