छठ पूजा का तीसरा दिन संध्या अर्घ्य के नाम से जाना जाता है। यह चार दिवसीय महापर्व का सबसे प्रमुख दिन माना जाता है। खरना का प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रती निर्जला व्रत रखते हैं और तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
इस दिन सुबह से ही घरों में ठेकुआ और अन्य प्रसाद बनने लगते हैं। शाम होते-होते परिवार के लोग बांस के सूप और दौरा में फल एवं प्रसाद सजाकर नदी, तालाब या बनाए गए छठ घाट की ओर निकलते हैं। घाट पर बजने वाले पारंपरिक छठ गीत पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं।
छठ पूजा का तीसरा दिन कब होता है?
संध्या अर्घ्य कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को दिया जाता है। इसी षष्ठी तिथि के कारण इस पर्व को छठ या छठी पूजा कहा जाता है।
अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इसकी तारीख प्रत्येक वर्ष बदलती है। सूर्यास्त का सही समय भी शहर के अनुसार अलग हो सकता है।
संध्या अर्घ्य का इतिहास
भारत में सूर्य उपासना की परंपरा बहुत प्राचीन है। छठ पूजा की शुरुआत किस समय और किस एक घटना से हुई, इसका निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसका वर्तमान स्वरूप बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों की लोक परंपराओं से विकसित हुआ माना जाता है।
लोकप्रिय धार्मिक कथाओं में महाभारत के कर्ण को सूर्यदेव का उपासक बताया गया है। एक अन्य मान्यता छठ व्रत को द्रौपदी और पांडवों से जोड़ती है। इन कथाओं ने सूर्य उपासना से जुड़ी आस्था को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
डूबते सूर्य को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?

आमतौर पर धार्मिक अनुष्ठानों में उगते सूर्य की पूजा की जाती है, लेकिन छठ में डूबते और उगते दोनों सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
डूबते सूर्य को अर्घ्य देना जीवन के हर चरण के प्रति सम्मान और आभार का प्रतीक माना जाता है। यह संदेश देता है कि जिस प्रकार उन्नति का सम्मान किया जाता है, उसी प्रकार जीवन में आने वाले बदलाव और ढलते समय को भी स्वीकार करना चाहिए।
धार्मिक मान्यता है कि संध्या अर्घ्य देने से सूर्यदेव और छठी मैया की कृपा प्राप्त होती है। व्रती परिवार के स्वास्थ्य, सुख-शांति, संतान की मंगलकामना और समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं।
संध्या अर्घ्य की आवश्यक सामग्री
- बांस का सूप और दौरा
- ठेकुआ
- चावल के लड्डू या कसार
- केला और नारियल
- गन्ना
- सेब, संतरा, मौसमी और अन्य फल
- मूली, अदरक या हल्दी का पौधा, परंपरा के अनुसार
- पान और सुपारी
- सिंदूर और अक्षत
- मिट्टी या पीतल का दीपक
- शुद्ध घी और रुई की बत्ती
- फूल और माला
- पीतल या तांबे का लोटा
- स्वच्छ जल या दूध-मिश्रित जल
- साफ कपड़ा
पूजा सामग्री में क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है।
संध्या अर्घ्य की पूजा विधि
1. प्रसाद तैयार करना
तीसरे दिन सुबह स्नान करने के बाद साफ रसोई में ठेकुआ, कसार और अन्य प्रसाद तैयार किए जाते हैं। प्रसाद बनाने में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसमें प्याज, लहसुन और नमक का प्रयोग नहीं होता।
2. सूप और दौरा सजाना
बांस के सूप और दौरा में ठेकुआ, फल, नारियल, गन्ना, दीपक और दूसरी पूजा सामग्री सजाई जाती है। प्रत्येक सामग्री को साफ पानी से धोकर रखा जाता है।
3. छठ घाट जाना
सूर्यास्त से कुछ समय पहले परिवार के सदस्य पूजा की सामग्री लेकर घाट पहुंचते हैं। कई स्थानों पर दौरा परिवार के सदस्य सिर पर रखकर घाट तक ले जाते हैं।
4. जल में खड़े होकर पूजा करना
व्रती सुरक्षित और साफ पानी में खड़े होकर सूर्यदेव का ध्यान करते हैं। परिवार के लोग व्रती के पास सूप और पूजा सामग्री लेकर खड़े रहते हैं।
5. डूबते सूर्य को अर्घ्य देना
सूर्यास्त के समय पीतल या तांबे के लोटे से सूर्यदेव को जल या दूध-मिश्रित जल अर्पित किया जाता है। व्रती छठी मैया और सूर्यदेव से परिवार की मंगलकामना के लिए प्रार्थना करते हैं।
6. दीपदान और घर वापसी
अर्घ्य के बाद घाट पर दीपक जलाए जाते हैं। पूजा पूरी होने पर प्रसाद और पूजा सामग्री को सम्मानपूर्वक वापस घर लाया जाता है। व्रती का निर्जला उपवास जारी रहता है।
अगली सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही छठ व्रत का पारण किया जाता है।
छठ पूजा के लिए पारंपरिक ठेकुआ की रेसिपी
ठेकुआ छठ पूजा का सबसे प्रसिद्ध प्रसाद है। इसे गेहूं के आटे, गुड़ और घी से तैयार किया जाता है। इसका स्वाद हल्का मीठा और बनावट बाहर से कुरकुरी तथा अंदर से थोड़ी मुलायम होती है।
ठेकुआ बनाने की सामग्री
- गेहूं का आटा – 2 कप
- गुड़ – तीन चौथाई कप
- देसी घी – एक चौथाई कप
- सौंफ – 1 छोटा चम्मच
- कद्दूकस किया नारियल – 2 बड़े चम्मच, वैकल्पिक
- इलायची पाउडर – आधा छोटा चम्मच, वैकल्पिक
- पानी – आवश्यकतानुसार
- तलने के लिए घी या साफ खाद्य तेल
ठेकुआ बनाने की विधि
1. गुड़ का घोल तैयार करें
गुड़ को छोटे टुकड़ों में तोड़ लें। एक बर्तन में लगभग आधा कप पानी गर्म करके उसमें गुड़ डालें। गुड़ पिघलने के बाद घोल को छानकर ठंडा होने दें।
2. आटा तैयार करें
एक बड़े बर्तन में गेहूं का आटा, सौंफ, नारियल और इलायची मिलाएं। इसमें देसी घी डालकर हथेलियों से अच्छी तरह मिलाएं।
3. सख्त आटा गूंधें
गुड़ का घोल थोड़ा-थोड़ा डालकर सख्त आटा गूंधें। आटा बहुत नरम नहीं होना चाहिए, अन्यथा ठेकुआ तलते समय टूट सकता है या अपना आकार खो सकता है।
आटे को लगभग 10 मिनट ढककर रखें।
4. ठेकुआ को आकार दें
आटे की छोटी लोइयां बनाएं और हथेली से हल्का चपटा करें। ठेकुआ के पारंपरिक सांचे, लकड़ी की डिजाइन या कांटे की सहायता से उस पर आकृति बनाएं।
5. धीमी आंच पर तलें
कड़ाही में घी या तेल को मध्यम गर्म करें। ठेकुआ को धीमी से मध्यम आंच पर दोनों तरफ से सुनहरा होने तक तलें।
बहुत तेज आंच पर तलने से ठेकुआ बाहर से जल्दी गहरा हो जाएगा और अंदर से कच्चा रह सकता है।
6. पूरी तरह ठंडा करें
तैयार ठेकुआ को थाली में निकालकर पूरी तरह ठंडा होने दें। ठंडा होने के बाद ही इसे सूप या दौरा में सजाएं।
संध्या अर्घ्य के समय ध्यान रखने वाली बातें
- घाट पर प्लास्टिक की थैलियां और डिस्पोजेबल सामान न ले जाएं।
- पूजा के बाद फल, फूल या प्लास्टिक को पानी में न फेंकें।
- बच्चों और बुजुर्गों को गहरे पानी में जाने से रोकें।
- केवल सुरक्षित और निर्धारित स्थान पर ही अर्घ्य दें।
- प्रसाद बनाते समय साफ हाथ, बर्तन और पानी का उपयोग करें।
- सूर्यास्त के समय की जानकारी स्थानीय पंचांग या विश्वसनीय स्रोत से जांच लें।
- स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर निर्जला व्रत रखने से पहले चिकित्सक की सलाह लें।
- पूजा की विधि में अपने परिवार की परंपरा को प्राथमिकता दें।
संध्या अर्घ्य से जुड़े सामान्य सवाल
संध्या अर्घ्य किस दिन दिया जाता है?
संध्या अर्घ्य कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को दिया जाता है। यह छठ पूजा का तीसरा दिन होता है।
संध्या अर्घ्य में सबसे खास प्रसाद कौन-सा है?
ठेकुआ छठ पूजा का प्रमुख प्रसाद है। इसके साथ कसार, केला, नारियल, गन्ना और अन्य मौसमी फल चढ़ाए जाते हैं।
क्या घर पर संध्या अर्घ्य दिया जा सकता है?
यदि नदी या तालाब के घाट पर जाना संभव या सुरक्षित न हो, तो स्वच्छ स्थान पर पानी का छोटा कुंड बनाकर परिवार की परंपरा के अनुसार अर्घ्य दिया जा सकता है।
निष्कर्ष
छठ पूजा का तीसरा दिन श्रद्धा, संयम और प्रकृति के प्रति आभार का दिन है। डूबते सूर्य को दिया जाने वाला संध्या अर्घ्य यह सिखाता है कि जीवन के हर रूप का सम्मान करना चाहिए। बांस के सूप, मौसमी फल, घर में बना ठेकुआ और घाट पर गूंजते लोकगीत इस पर्व को विशेष बनाते हैं।